तुम भी बनो जासूस! असली खोपड़ियों से पढ़िए मांसाहारी और शाकाहारी जानवरों का “छिपा हुआ जीवन-वृत्तांत”
नमस्ते! मैं हूँ कुवाको केन, आपका साइंस ट्रेनर। मेरे लिए हर दिन एक नया प्रयोग है।
अगर आपके सामने किसी जानवर की सफेद चमकदार हड्डी आ जाए, तो आपको कैसा लगेगा? क्या आप डर जाएंगे या फिर आपको यह कुछ ‘कूल’ लगेगा? सच तो यह है कि किसी जानवर की खोपड़ी उसके जीवन का एक ऐसा दस्तावेज़ होती है, जो चिल्ला-चिल्लाकर बताती है कि उसने क्या खाया, दुनिया को किस नज़र से देखा और अपनी ज़िंदगी कैसे जी।

आज मैं आपको अपनी एक खास साइंस क्लास की झलक दिखाऊंगा। इसमें हमने उन जानवरों की असली खोपड़ियों (Skulls) का इस्तेमाल किया है, जिन्होंने सड़क दुर्घटनाओं जैसे दुर्भाग्यपूर्ण कारणों से अपनी जान गंवाई। इन अवशेषों को पूरे सम्मान के साथ सहेज कर पढ़ाई के लिए तैयार किया गया है। यह अद्भुत शिक्षण सामग्री मुझे मेरे सहयोगी शोधकर्ता वाई-सेंसई (Y-Sensei) ने भेजी है, और आज की क्लास का पूरा ढांचा भी उन्हीं के मार्गदर्शन में तैयार किया गया है। वाई-सेंसई, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!
खामोश हड्डियाँ, जो जंगल की हकीकत बयां करती हैं
क्लास में हमारे पास मार्टन (Ten), भालू, रैकून और घरेलू बिल्ली जैसी असली हड्डियाँ थीं। ये किताबों में छपी तस्वीरों या रेखाचित्रों से बिल्कुल अलग होती हैं। इनके पास जाने पर आपको एक अलग ही अहसास और कुदरत की ताकत का अनुभव होता है।

मार्टन (Marthen)

घरेलू बिल्ली

बंदर

भालू

एक जासूस की तरह पहचानें असली अपराधी!
क्लास में छात्रों को एक जासूस की तरह काम दिया गया। हर ग्रुप की टेबल पर एक खोपड़ी रखी गई और उन्हें उसकी बनावट देखकर यह अंदाज़ा लगाना था कि वह जानवर शाकाहारी है, मांसाहारी है या सर्वाहारी? और आखिर वह कौन सा जानवर है?

जापानी हिरण

सीरो (Kamoshika)

नेवला (Weasel)

तनूकी (Raccoon Dog)

रैकून
छात्रों के बीच उत्साह देखते ही बनता था। कोई कह रहा था, “देखो इसके दांत कितने नुकीले हैं, यह पक्का मांस खाता होगा!” तो कोई तर्क दे रहा था, “इसकी आंखें किनारे पर हैं, शायद इसलिए ताकि यह अपने दुश्मनों को जल्दी देख सके।” वे बारीक से बारीक चीज़ों की जांच कर रहे थे। “क्या यह टाइगर है?” “नहीं, अगर यह जापान का जानवर है तो शायद मार्टन हो सकता है!” उनकी चर्चाओं में गहरी गंभीरता और उत्सुकता थी।



हर बनावट के पीछे एक ठोस वजह होती है
मिसाल के तौर पर, बंदर की खोपड़ी को देखिए। उसकी आंखों के गड्ढे बिल्कुल सामने की तरफ होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूदते समय उसे दूरी का सटीक अंदाज़ा लगाने के लिए ‘3D विजन’ की ज़रूरत होती है। दूसरी ओर, हिरण जैसे शाकाहारी जानवरों की आंखें चेहरे के किनारे पर होती हैं। यह इस बात का सबूत है कि घास चरते समय भी वे अपने पीछे से आने वाले शिकारियों पर नज़र रख सकें और उनका व्यू एरिया (Field of view) ज़्यादा से ज़्यादा हो।

दांतों की बनावट भी बहुत कुछ कहती है। भालू के निचले जबड़े को ध्यान से देखें। इसमें नुकीले शिकार वाले दांतों के साथ-साथ पीछे की तरफ चपटी दाढ़ें भी होती हैं, जो भोजन पीसने के काम आती हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि भालू सर्वाहारी है, यानी वह मांस और पौधे दोनों खाता है। हड्डी का हर एक हिस्सा प्रकृति की बेहतरीन इंजीनियरिंग का नमूना है।
यह रहा भालू का निचला जबड़ा।


असली चीज़ों से मिलता जीवन का सबक
क्लास के अंत में हमने सही जवाबों पर चर्चा की और हर जानवर के रहन-सहन के बारे में बताया। इन हड्डियों के ज़रिए छात्रों ने महसूस किया कि कैसे ये जानवर पहाड़ों में शिकार करते थे या अपनी जान बचाते थे। यह जीवन के उस महान चक्र को समझने का एक ज़रिया बना, जिससे हम सब जुड़े हैं।

बच्चों की चमकती आंखों को देखकर मुझे फिर से यकीन हो गया कि विज्ञान की शिक्षा में ‘असली अनुभव’ कितना ज़रूरी है। अपनी ज़िंदगी पूरी कर चुके इन जानवरों द्वारा छोड़ी गई ये हड्डियाँ आज हमारी सबसे बेहतरीन टीचर हैं, जो हमें विकास और अनुकूलन (Evolution and Adaptation) जैसी विज्ञान की जादुई कहानियाँ सुनाती हैं।

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